<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2374532875810120150</id><updated>2012-02-17T02:19:58.359+05:30</updated><category term='मीडिया'/><category term='अश्लीलता'/><title type='text'>व्यंग्य-लेख</title><subtitle type='html'>इस चिट्ठे पर प्रकाशित सभी रचनाओं का प्रतिलिप्याधिकार चिराग जैन के पास सुरक्षित है। इनके पुनर्प्रकाशन हेतु लेखक की लिखित अनुमति आवश्यक है
-चिराग जैन</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://vyangya-chiragjain.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2374532875810120150/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vyangya-chiragjain.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>चिराग जैन CHIRAG JAIN</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17583261076632477694</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_H0Tl3mgkiPU/SZLrpT8MmiI/AAAAAAAAAsM/-Jydp4AzX1c/S220/CHIRAG.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>3</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2374532875810120150.post-1669292675361978896</id><published>2009-08-07T17:27:00.000+05:30</published><updated>2009-08-07T17:28:09.729+05:30</updated><title type='text'>लो वेस्ट जीन्स पर बैन</title><content type='html'>पिछले दिनों इस बात से पूरे समाज में सनसनी फैल गई कि अब लड़के-लड़कियाँ लो वेस्ट जीन्स नहीं पहन सकेंगे। मुद्दआ ये है कि इस प्रकार के परिधानों को उत्तोजक बताते हुए इन पर बैन लगा दिया गया है। अब ये विषय विश्वविद्यालयों की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं से लेकर  साहित्यिक पत्रिकाओं के वाद-विवाद व्यवसाय तक छाया रहेगा।&lt;br /&gt; दरअसल हमारा जागरूक समाज इस निर्णय को इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि यह हमारे मौलिक अधिकार 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का हनन है। इस संदर्भ में परम आदरणीया मल्लिका जी की एक सूक्ति उध्दृत की जा सकती है। जब उनके परिधानों को लेकर कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने हंगामा खड़ा किया था तो मल्लिका जी ने यह उद्बोधन देकर मुआमला शांत किया था कि मेरे पास ख़ूबसूरत बदन है तो मैं क्यों न दिखाऊँ। तर्क में दम था। सो हंगामाजीवियों को साँप सूंघ गया और संपादकीय पृष्ठों से उठा विवाद पेज थ्री के इस बयान से समाप्त हो गया।&lt;br /&gt; कदाचित् बुध्दिजीवियों ने यह सोचकर विवाद को आगे नहीं बढ़ाया कि यदि कल को मल्लिका जी ने उन्हें कम कपड़े पहनने की चुनौती दे डाली तो क्या होगा! सो अपनी इज्ज़त अपने हाथ....। ख़ैर कपड़ों की तरह विषय भी भटक गया था। सो वापस लो वेस्ट जीन्स पर आते हैं।&lt;br /&gt; यह मुआमला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का नहीं है अपितु हमारे सभ्य समाज की 'अनुभूति की स्वतंत्रता' का भी है। जब कुछ 'सुराग़' ही नहीं दिखाई देगा तो कल्पनाशील समाज पूरी तस्वीर की कल्पना कैसे करेगा। और जब तस्वीर की कल्पना ही नहीं होगी तो वह सुखद अनुभूति कैसे होगी जो..........!&lt;br /&gt; इतना ही नहीं, ये निर्णय पुन: हमारे समाज की महिलाओं को उसी पुरुषवादी कठघरे में ला खड़ा करने का एक षडयंत्र है जिससे बाहर आने के लिए सैंकड़ों लोग महिला-मुक्ति का झंडा उठाए कमा रहे हैं। पहले पुरुषों ने धर्म के नाम पर महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में क़ैद कर रखा था और अब पूरे कपड़ों में क़ैद करने के लिए समाज और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है।&lt;br /&gt; ये अन्याय नहीं चलेगा। और चूंकि क्रांति दबाने से और भड़कती है इसलिए यदि पुरुष यूँ ही मनमानी करते रहे और महिलाओं को पूरे कपड़े पहनाने को विवश किया गया तो महिलाएँ इसका और भी अधिक विरोध करेंगी और कोई कॉरपोरेट कंपनी अपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभाते हुए लो थाइज़ जीन्स लांच कर देगी। फिर देखते रह जाएंगे सारे पुरुष!&lt;br /&gt; सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए इस निर्णय पर बैन लगाए। ज़रा सोचिए! एक ग़रीब आदमी जो अभी दो सप्ताह पहले लिवाइज़ की जीन्स ख़रीद कर लाया है, इस निर्णय के लागू होने से उसके दिल पर क्या बीतेगी। कहाँ से लाएगा नई जीन्स ख़रीदने के लिए वह पैसा। जिस दौर में लोगों के पास दाल-रोटी के लाले हैं, ऐसे में सरकार ने यदि इस प्रकार के निर्णयों पर रोक नहीं लगाई तो ग़रीबी कितनी बढ़ जाएगी।&lt;br /&gt; वैसे भी जब गांधी जी अपने देशवासियों की चिंता में अपने पायजामे को धोती में बदल सकते हैं, तो गांधी जी के अनुयायी अपनी जीन्स को थोड़ा छोटा नहीं कर सकते। ये और बात है कि गांधी जी ने पाऊँचे काटे थे और हमने बैल्ट! पर मूल मुद्दआ तो कटौती का है। और कटौती हम कर रहे हैं। अब इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए और इसको जीन्स से हटाकर टॉप पर लागू करना चाहिए कि जो लो वेस्ट टॉप पहनेगा उस पर ज़ुर्माना किया जाएगा। इससे हमारे टॉप भी ऊपर उठेंगे और 'संस्कृति' भी!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2374532875810120150-1669292675361978896?l=vyangya-chiragjain.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vyangya-chiragjain.blogspot.com/feeds/1669292675361978896/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2374532875810120150&amp;postID=1669292675361978896' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2374532875810120150/posts/default/1669292675361978896'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2374532875810120150/posts/default/1669292675361978896'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vyangya-chiragjain.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='लो वेस्ट जीन्स पर बैन'/><author><name>चिराग जैन CHIRAG JAIN</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17583261076632477694</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_H0Tl3mgkiPU/SZLrpT8MmiI/AAAAAAAAAsM/-Jydp4AzX1c/S220/CHIRAG.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2374532875810120150.post-6098370705344757296</id><published>2009-05-28T18:18:00.000+05:30</published><updated>2009-05-28T18:20:24.613+05:30</updated><title type='text'>काव्य के गहन सिध्दांत</title><content type='html'>साहित्य संस्कृति का दर्पण है। इसी सूक्ति को ध्यान में रखते हुए हिन्दी कविता हमेशा से ही हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का अनुपालन करती रही है। यह और बात है कि इन सिध्दांतों की आड़ में काव्य के मूल सिध्दांत और स्वयं कविता भी 'गहरे अर्थों में' बैकुण्ठवासी हो चली है। (यहाँ पर 'गहरे अर्थों में' लिखने का लाभ यह है कि अब कोई मुझसे इसका अर्थ पूछेगा नहीं, क्योंकि वास्तव में उन अर्थों से मैं स्वयं भी परिचित नहीं हूँ, लेकिन लोग यह सोचकर मुझसे इन अर्थों का संज्ञान नहीं लेंगे कि अगर उन्होंने पूछा तो यह स्वत: ही सिध्द हो जाएगा कि उनकी सोच गहरी नहीं है।) यहाँ पर सामाजिक भय का सिध्दांत कार्य करता है।&lt;br /&gt;हमारी संस्कृति हमेशा से ही अतिथियों को भगवान मानती रही है। यह दीगर बात है कि इसी सिध्दांत का लाभ उठाकर रावण सीता को उठाकर ले गया था और हरिश्चंद्र को राजा के पद से च्युत होकर श्मशान का पंडित बनना पड़ा और न जाने क्या-क्या अपमान भोगना पड़ा। ख़ैर '&lt;b&gt;अतिथिदेवोभव:&lt;/b&gt;' के सिध्दांत की परमकृपा के चलते बाबा तुलसी अपना गृहनगर छोड़ते ही परमात्मा स्वरूप पूजे जाने लगे। यदि उस ज़माने में हवाई जहाजों का चलन होता तो रामचरितमानस् की पहली प्रति यूएसए अथवा यूरोप के किसी 'बड़े' प्रकाशक बंधु ने आर्टपेपर पर फोरकलर में छापी होती। ...लेकिन &lt;b&gt;लाल रंग तिसको लगा, जिसके बड़ भागा&lt;/b&gt; (इसी कारण हतभागियों की किताब काले रंग से छपती है)।&lt;br /&gt;इस सिध्दांत में भारतीय जुगाड़ संहिता की धारा 420 के अनुच्छेद 1 में एक छूट मिलती है- 'यह कि यदि कोई धनिक जो कि भारत का नागरिक है, किसी विशेष अथवा सामान्य कारण से भारतीय भौगोलिक क्षेत्र से बाहर अपना निवास निर्माण नहीं कर पाया है तो भी उसकी खाता विवरणिका (बैंक स्टेटमेंट) में उपलब्ध शेष राशि के न्यूनतम अष्ट अंकीय होने को आधार मानकर उसके काव्य को श्रेष्ठ काव्य की श्रेणी में गणित किया जा सकता है।' &lt;b&gt;जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे को सब कुछ दरसाई! &lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: normal; "&gt;&lt;b&gt;बहिरो सुरै मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई!&lt;/b&gt; (यहाँ पर जाकी से सूरदास जी का तात्पर्य बैंक बैलेंस से है)।&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;div&gt;इसी धारा के अनुच्छेद 2 के अनुसार- 'यदि कोई भारतीय नागरिक राजकीय सेवा में किसी ऐसे पद पर विराजमान है जहाँ से वह साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों अथवा अकादमियों के सचिवों को विदेश यात्रा अथवा पुरस्कारों का वरदान देने में सक्षम हो तथा इस योग्यता के साथ-साथ स्वयं को कवि भी मानता हो तो उसके काव्यकर्म का सम्मान करना संपादकों तथा अकादमियों का परमर् कत्ताव्य बन जाता है।' &lt;b&gt;जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करें सब कोई&lt;/b&gt; (इस चौपाई के रचनाकाल में घट-घट वासी राम सरकारी कुर्सी में जा बसे थे)।&lt;br /&gt;बाद में कुछ विशेष प्रयोजनों के चलते इस धारा में एक अनुच्छेद और जोड़ा गया जिसके अनुसार- 'यह कि यदि कोई धनाढय मनुज जो कि एक पंक्ति भी शुध्द नहीं लिख सकता, ऐसे नागरिक को यदि कवि बनने की उत्कंठा जागे तो उसकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रकाशकों का दायित्व बन जाता है कि भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का प्रयोग करते हुए उन्हें पाण्डुलिपि तैयार करके देवें। इसके लिए समय-समय पर कुछ 'वास्तविक' निर्धन कवियों की पाण्डुलिपि को यह कह कर निरस्त किया जाना होगा कि उनकी कविताएँ तो कूड़ा हैं। ऐसा कहकर निर्धन कवियों की रचनाओं को गुदड़ी में फेंक देना अपरिहार्य है ताकि समय पड़ने पर 'गुदड़ी के लाल' ढूंढे जा सकें और एक उत्ताम पुरस्कारणीय पाण्डुलिपि तैयार की जा सके। &lt;b&gt;विदेशी होगा पहला कवि, प्लेन से आया होगा गान, निकलकर रिजेक्टिड से चुपचाप, छपी होगी कविता अनजान।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार सभी भारतीय कवियों, साहित्यकारों, अप्रवासियों, धनिकों, प्रकाशकों, अधिकारियों तथा अन्य प्रत्येक नागरिक का धन्यवाद करते हुए अपनी आदत के अनुसार एक श्लोक को उध्दृत करना चाहूंगा। यह श्लोक वास्तव में प्रूफ की अशुध्दियों के चलते लम्बे समय से ग़लत छपता रहा है। आज मैं यहाँ पर उसका असली रूप प्रकाशित कर रहा हूँ-&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मा लेखक प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।&lt;br /&gt;यत् धनाढयजुगाड़ादेकमवधी काव्यमोहितम्॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् हे लेखक! तुझे प्रतिष्ठा, आदर-सत्कार, मान-मर्यादा, गौरव, प्रसिध्दि, ख्याति, यश, कीर्ति, स्थिति, स्थान, स्थापना, ठौर, ठिकाना, ठहराव, आश्रय इत्यादि नित्य-निरंतर कभी भी न मिले, क्योंकि तूने इस जुगाड़तंत्र में निमग्न धनिकों/राजनायिकों/अप्रवासियों (जिनसे प्रकाशकों/अकादमिकों को कुछ लाभ हो सकता था) की, बिना किसी पत्रिका में प्रकाशित हुए ही आलोचना की है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2374532875810120150-6098370705344757296?l=vyangya-chiragjain.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vyangya-chiragjain.blogspot.com/feeds/6098370705344757296/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2374532875810120150&amp;postID=6098370705344757296' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2374532875810120150/posts/default/6098370705344757296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2374532875810120150/posts/default/6098370705344757296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vyangya-chiragjain.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='काव्य के गहन सिध्दांत'/><author><name>चिराग जैन CHIRAG JAIN</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17583261076632477694</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_H0Tl3mgkiPU/SZLrpT8MmiI/AAAAAAAAAsM/-Jydp4AzX1c/S220/CHIRAG.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2374532875810120150.post-4274926462832185389</id><published>2007-10-29T12:59:00.000+05:30</published><updated>2008-04-08T15:47:06.737+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अश्लीलता'/><title type='text'>युवा हो गया मीडिया</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;पिछले दिनों फैशन टी वी पर यह कह कर प्रतिबंध लगाया गया कि उस पर फैशन कार्यक्रमों की आड़ में अश्लीलता परोसी जा रही है। प्रतिबंध लगा और हट भी गया, लेकिन इस से किसी को कोई फर्क नहीं पडा। क्योंकि अब हमारे देश का दर्शक वर्ग उत्तेजक दृश्यों के लिए कुछ गिने-चुने अंग्रेजी चैनलों पर ही निर्भर नहीं रह गया है। न्यूज़ मीडिया ने अंग्रेजी चैनल्स के एकाधिकार को समाप्त कर दिया है। अपराध बुलेटिनों के नाम पर रोज़ रात को सोने से पहले किसी के यौन-शोषण, अश्लील एसएमएस, बलात्कार, अवैध संबंध, देह व्यापार और बार-डांस, की घटनाओं का जो परत-दर-परत विश्लेषण दिखाया जाता है वह देश में वी टी वी, एम टी वी, एफ़ टी वी और इस प्रकार के अन्य विदेशी चैनल्स के महत्व को कम करने के लिए पर्याप्त है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;जो कुछ क़सर इस क्षेत्र में बाक़ी थी भी उसको पूरा करने के लिए देश भर के सिने कलाकारों और कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रसेवा की भावना से भर कर मीडिया का साथ देने का निश्चय किया है। जिस दिन 'दुर्भाग्यवश' उक्त किस्म की कोई घटना प्रकाश में आने को तैयार नहीं होती उस दिन कोई न कोई सेलिब्रिटी किसी न किसी कार्यक्रम में किसी न किसी सेलिब्रिटी को चूम लेती है, और हो जाता है समस्या का समाधान। इस प्रकार यौन-विषयों पर शोध कर रहे आधुनिक वात्स्यायनों की भीष्म-प्रतिज्ञा खंडित होने से बाल-बाल बच जाती है। यदा-यदा हि यौनस्य, ग्लानिर्भवति चैनल:.....&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;कुल १० सैकेंड के चुम्बन काण्ड को १३-१४ घंटे तक कैसे दिखाना है, इस कार्य में हमारे मीडिया को वीरगाथा काल के कवियों से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त है। पहले डेढ़-दो घंटे तक चुम्बन दृश्य का रीप्ले होता है और पीछे से एंकर की आवाज़ रनिंग कमेंट्री की तर्ज़ पर निरंतर सुनाई देती है- "आप देख सकते हैं कि किस प्रकार 'सर-ए-आम' शिल्पा शेट्टी को अअअ... आलिंगन में भरते हुए किस्स्स्स्स्स किया रिचर्ड ने। (रीप्ले) ....एक बार फिर हम अपने दर्शकों को दिखा रहे हैं ताज़ा तस्वीर पूरे घटनाक्रम की.... एड्स अवेयरनेस का कार्यक्रम था जिसमें रिचर्ड ने 'सर-ए-आम' शिल्पा शेट्टी को किस किया। (रीप्ले) .....एक बार फिर से देखिए वो तस्वीरें जिनमें मुस्कुराते हुए रिचर्ड गेरे बिना किसी हिचकिचाहट के 'सर-ए-आम' शिल्पा को चूम रहे हैं.......... किसी भी तरह की कोई झिझक या तनाव नहीं दिखाई दे रहा है शिल्पा शेट्टी के चेहरे पर।" &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;इस प्रकार, जब उस दृश्य को देखकर बोले जा सकने वाले तमाम वाक्य दर्शकों को कंठस्थ हो जाते हैं तब तक गैस्टगण स्टूडियो में पहुंच चुके होते हैं। फिर इस मुद्दे पर ज़बरदस्त बहस होती है। फिर उन लोगों से सम्पर्क साधा जाता है जो बुद्धिजीवी होते हुए भी कुछ विशेष आर्थिक कारणों से स्टूडियो तक नहीं पहुंच सके। उसके बाद सीन पर मौजूद हस्तियों से सम्पर्क साधा जाता है। और खबर के सभी पक्षों का मत जानने के लिए घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार कार्यक्रम में मौजूद दर्शकों से बातचीत करता है-&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:85%;"&gt;"आप उस वक़्त कार्यक्रम जी हाँ मैं, उस समय आगे से दूसरी जी हाँ मैं?"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:85%;"&gt;"जी हाँ! मैं उस समय आगे से दूसरी पंक्ति में आठवीं कुर्सी पर पैर ऊपर करके बैठा था। और उस समय मेरी गर्दन....."&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:85%;"&gt;"तो आप यह बताइये कि कैसे हुआ ये सारा घटनाक्रम?"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:85%;"&gt;"...बस शिल्पा शेट्टी ने रिचर्ड गेरे को मंच पर बुलाया और फिर रिचर्ड गेरे ने आकर शिल्पा शेट्टी का हाथ पकड़ लिया और फिर उसको अपनी और खींच लिया और गले लगा लिया जी। अजी शिल्पा शेट्टी चाहती तो उस अंग्रेज़ को थप्पड़ मार सकती थी लेकिन जी उसको तो इस सब की आदत है जी।"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;इसके बाद पत्रकार और एंकर के बीच कुछ अध्यक्षीय स्तर की बातचीत होती है। इस प्रकार १२-१३ घंटे के कठोर परिश्रम के बाद पत्रकारों का पूरा दल प्रदत्त विषय पर शोध ग्रंथ तैयार कर देता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;ऐसा ही एक अन्य उदाहरण पिछले दिनों एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री के अश्लील एमएमएस का हो सकता है। किसी मसाज पार्लर में बने इस एमएमएस का शालीनिकरण कर सभी न्यूज़ चैनल्स ने प्रसारित किया। इस के साथ ही सनद स्वरूप उक्त अभिनेत्री के किसी पुराने एम एम एस की भी झलक दिखाई गयी जिसमें उसको नहाते हुए दिखाया गया है। इन दोनों ही कार्यक्रमों को प्रसारित करते समय स्क्रीन के कुछ हिस्सों को अर्द्धपारदर्शी पट्टी से ढँक दिया गया था और साथ ही हैडर और फूटर में उन वेबसाईट का नाम दिया गया था जहाँ से न्यूज़ चैनल्स ने उक्त क्लिप साभार प्राप्त की थी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;यह तो था प्रदर्शित सत्य, लेकिन इन दृश्यों के साथ वेबसाईट का नाम देने के पीछे एक मूक संदेश था- "प्रिय दर्शकों! कुछ अनर्गल कानूनों की वजह से हम आपको ये दृश्य पूरी तरह नहीं दिखा पा रहे हैं। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। लेकिन आपकी सुविधाओं और रुचियों का ध्यान रखते हुए हमने इस कार्यक्रम का प्रसारण ऐसे समय पर किया है जब सभी सरकारी कार्यालय बंद हो चुके हैं। सो इस से पहले कि हमारे चैनल पर प्रसारित होने के कारण इस खबर पर कोई कार्रवाई हो और सरकार उक्त साईट को बैन कर दे, आप तुरंत अपना इंटरनैट खोलिए और इन क्लिप्स को डाउनलोड कर लीजिये। आपके पास पूरे १२ घंटे का समय है। काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में एक्शन होएगा, लॉगिन करेगा कब।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;दरअसल इस प्रकार की ख़बरों में समाचार चैनल्स कि विशेष रूचि का कारण यह है कि ऐसी एक ही खबर मीडिया के तीनों लक्ष्यों (शिक्षा, सूचना और मनोरंजन) को लक्ष्य करती है। समाचार जगत की अन्य किसी विधा में इतना बूता नहीं है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;इस सारी समीक्षा का लब्ब-ओ-लुआब यह है कि हमारा मीडिया पूरी तरह जागृत है और मैच्योर हो गया है। यही कारण है कि अपने बचपन के दौर में भारतीय पत्रकारिता देश-भक्ति के गीत गाया करती थी, और यौवन आते-आते कॉलेज लाइफ को ऎन्जॉय करने लगी। सो देश-भक्ति की बोर और बचकानी बातों की संकीर्ण मानसिकता से बाहर आकर ग्लोबल वे में उन विषयों पर खुलकर चर्चा करने लगा है जिन्हें छूना बच्चों के लिए निषेध होता है। शरीर विज्ञान की भाषा में कहें तो मीडिया में अब हार्मोनल चेंज आ गए हैं। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2374532875810120150-4274926462832185389?l=vyangya-chiragjain.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vyangya-chiragjain.blogspot.com/feeds/4274926462832185389/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2374532875810120150&amp;postID=4274926462832185389' title='3 Comments'/><link rel='edit' 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